हलछट पूजन विधि :-
हर छठ, हलछठ, ललही छठ या फिर बलराम जयंती इन सभी त्यौहारों के नाम से आज के पावन दिन को मनाया जाता हैं ! श्री कृष्ण के बड़े भाई के रूप में स्वयम शेषनाग ने प्रभु श्री कृष्ण के सहायतार्थ हेतू भाद्रपद महीने की कृष्ण षष्ठी को जन्म लिया था!हलछठ व्रत भाद्र पद की कृष्ण पक्ष षष्ठी को किया जाता हैं! श्री बलराम जी के मुख्य शास्त्रों में हल और मूसल का नाम उल्लेखनीय माना जाता हैं ! इसी कारण वश इस दिन को हल षष्ठी के नाम से जाना जाता हैं!व्रत विधि पुत्रवती स्त्रियाँ ही इस व्रत को करती है! इस दिन महुए की दातून करने का भी विधान हैं! पारण के समय हल से जोता बोया अन्न नहीं खाना चाहिए ! इस कारण इस व्रत का सेवन करने वाली स्त्रियाँ नीवार या फरनही के चावल का सेवन करती हैं! इस दिन गाय का दूध भी वर्जित हैं !विधि विधान में प्रातः पुत्रवती स्त्रियाँ भूमि (आँगन ) लीपकर या साफ कर एक कुंड बनाती हैं!जिसमे बेरी, पलाश, गूलर, कुश, प्रभुत्ति, की टहनिया गाड़कर हल षष्ठी या ललही छठ पूजा की जाती हैं ! पूजन में सतनजा (गेहूं , चना , धान , मक्का , अरहर, ज्वार, बाजरे) आदि का भुना हुआ लावा चढाया जाता हैं! हलके रंगों से रंगा वस्त्र तथा कुछ सुहाग सामग्री भी चढ़ाई जाती हैं ! पूजनोपरांत निम्न मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिए !हलषष्ठी मंत्रगंगा द्वारे कुशावर्ते विल्वके नील पर्वते ! स्नात्वा कंरवले देवी हर लब्धवति पतिम !!हलषष्ठी मंत्रगंगा द्वारे कुशावर्ते विल्वके नील पर्वते ! स्नात्वा कंरवले देवी हर लब्धवति पतिम !!अर्थ - हे देवी आपने गंगा द्वारा कुशावर्त विल्वक नील पर्वत और करनवल तीर्थ में स्नान करके भगवान् शंकर को पति रूप में प्राप्त किया हैं! सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बार २ प्रणाम हैं! आप मुझे अचल सुहाग दीजिये ! ऐसी प्रार्थना करने से अंत में शिव धाम की प्राप्ति होती हैं!व्रत की कथाप्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसव काल अत्यंत निकट था! एक ओर वह पीड़ा से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका चित्त गोरस विक्रय में भी लगा था!उसने विचार किया कि यदि बच्चा उत्पन्न हो गया तो फिर दूध दही ऐसे ही पड़े रह जायेंगे यह सोच विचार कर वह झट से उठी तथा सर पर गोरस ( दूध , दही ) की मटकिया रख कर बेचने चल दी !आगे चलकर बढ़ी ही थी कि उसे असाध्य पीड़ा उत्पन्न होने से वह एक बनवेरी की ओट में बैठ गई ! कुछ ही देर में वहां उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ !अल्हड़ ग्वालिन ने नवजात शिशु को वहीँ छोड़ कर स्वयं दूध और दही बेचने निकट के गावों को चल पड़ी!संयोगवश उस दिन हल षष्ठी भी था !हल षष्ठी में गाय का दूध वर्जित हैं पर ग्वालिन ने सभी गावं वासियों को दूध भैस का दूध कह कर बेचा और ग्रामीरों को खूब ठगा ! जिस बनवेरी में उसने बच्चे को छोड़ा था, उसी के समीप एक कृषक हल जोत रहा था ! अकस्मात बैलों के भड़कने से चपेट में आकर उस ग्वालिन का पुत्र हल का फलक घुसने से मर गया ! यह घटना देख कर कृषक बहुत दुखी हुआ तथा मृत्यु उपरांत क्या कर सकता था फिर भी लाचार हो उसने बन वेरी के काटों से बच्चे के पेट पर टांका लगाकर घटना स्थल पर छोड़ दिया ! तत्क्षण ग्वालिन भी विक्रय कर वहां पहुंची ! बच्चे की यह दशा देख कर उसने अपने ही कर्मों और पाप का प्रतिफल समझ आ गया था! फिर उसने सोचा कि यदि मैं हल षष्ठी के दिन दूध दही विक्रय हेतु मिथ्या भाषण करके उन ग्रामीण नारियों का धर्म नष्ट न किया होता तो यह दशा न होती ! इसलिए अब लौटकर सब बातें प्रकट कर लोगों के सामने मुझे प्रायश्चित करना चाहिए ! ऐसा निश्चय कर वह उन सभी गावों में गई जहाँ २ उसने दूध दही बेचा था ! वह गली २ घूम २ कर कहने लगी कि मैंने जो दूध बेचा था वह गाय का दूध था , भैस का दूध नहीं था ! यह सुनकर सभी स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ उसे आशीर्वाद दिया !बहुत सी स्त्रियों से आशीष लेकर जब वह पुनः वन में गई तो उसका पुत्र जीवित मिला तभी से उसने स्वार्थ सिद्धि के लिए झूठ बोलना ब्रह्म हत्या के समान निकृष्ट कर्म समझ कर छोड़ दिया ! किन्ही २ प्रान्तों में ललही छठ - ललिता ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता हैं! 
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